आधुनिक भारत का नया ‘अछूत’ सवर्ण: क्या राजनीति के चक्कर में हाशिए पर जा रहा है, देश का सवर्ण समाज?

आधुनिक भारत का नया 'अछूत' सवर्ण

दिल्ली के एक तंग इलाके में सुबह के 4 बजे जब दुनिया सो रही होती है, 22 साल के आर्यन की टेबल लैंप जल रही होती है। आर्यन के पिता ने गांव की अपनी आखिरी पुश्तैनी जमीन का टुकड़ा इसलिए बेच दिया ताकि उनका बेटा दिल्ली में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सके।

आर्यन की त्रासदी यह नहीं है कि वह गरीब है, बल्कि यह है कि वह ‘सवर्ण’ है। वह जानता है कि उसके पास ‘गलती’ करने की गुंजाइश शून्य है। वह एक ऐसी दौड़ का हिस्सा है जहां उसके पैरों में ‘योग्यता’ की बेड़ियाँ हैं और फिनिशिंग लाइन दूसरों के मुकाबले कोसों दूर खिसका दी गई है।

1. विकास का इंजन, पर पहचान से वंचित: आर्थिक डेटा क्या कहता है?

भारत के आर्थिक ढांचे को खड़ा करने में जिस वर्ग का पसीना सबसे ज्यादा लगा है, उसे ही आज ‘संसाधनों का कब्जाधारी’ कहकर प्रचारित किया जा रहा है।

  • टैक्स का बोझ: भारत में प्रत्यक्ष कर (Income Tax) देने वाले कुल करदाताओं में सवर्ण या फॉरवर्ड क्लास की हिस्सेदारी सर्वाधिक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल व्यक्तिगत आयकर का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी वर्ग से आता है।
  • आईटी और स्टार्टअप क्रांति: भारत को वैश्विक ‘आईटी हब’ बनाने वाले और सिलिकॉन वैली में भारत का परचम लहराने वाले अधिकांश युवा इसी वर्ग से निकले हैं।बदले में उन्हें उचित सम्मान तक नहीं मिलता है.
  • राजनीतिक नैरेटिव: राहुल गांधी जैसे नेताओं द्वारा रैलियों में बार-बार ‘देश की संपत्ति पर कुछ खास लोगों का कब्जा’ जैसे बयान दिए जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘सफलता’ को ‘कब्जे’ के रूप में पेश करने की एक खतरनाक कोशिश है, जो एक पूरे समुदाय के खिलाफ द्वेष पैदा कर सकती है।

2. पूर्वजों के ‘पाप’ और आज की पीढ़ी को ‘दंड’

भारतीय राजनीति में एक तर्क बार-बार उछाला जाता है— “तीन हजार साल के शोषण का बदला।” लेकिन आधुनिक न्यायशास्त्र और मानवाधिकारों के विशेषज्ञ इस पर सवाल उठाते हैं।

  • विरासत में सजा: क्या न्याय का सिद्धांत यह कहता है कि परदादा के किए की सजा पोते को मिले? अगर किसी पूर्वज ने कोई सामाजिक अपराध किया था, तो क्या आज की पीढ़ी का संवैधानिक बहिष्कार जायज है?
  • प्रतिशोधी मानसिकता: टीवी डिबेट्स के दौरान आरजेडी (RJD) प्रवक्ता कांचना यादव जैसे नेताओं के बयान, जिनमें वे कथित तौर पर ‘सवर्णों को कानूनों में फँसाने’ की बात करती हैं, एक डरावनी मानसिकता को दर्शाते हैं।
  • सॉफ्ट टारगेट: राजनीतिक दल जानते हैं कि सवर्ण वर्ग बिखरा हुआ है और वह वोट बैंक के रूप में उतना संगठित नहीं है, इसलिए उन्हें ‘सॉफ्ट टारगेट’ बनाना आसान होता है।
  • राजनीतिक अछूत : सवर्ण वर्ग एक ऐसा वर्ग है, जिसका समर्थन या जिनके बातों को कोई राजनीतिक पार्टी नहीं रखना चाहती है.

3. जातिगत भेदभाव का दोहरा मापदंड और वैश्विक सत्य

यह कहना कि भेदभाव केवल सवर्णों ने फैलाया है, ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से अधूरा सत्य है।

  • आंतरिक भेदभाव: समाजशास्त्रियों के अनुसार, ओबीसी (OBC) और दलित वर्गों के भीतर भी उप-जातियों के बीच गहरे भेदभाव मौजूद हैं। क्या इसके लिए भी सवर्ण जिम्मेदार हैं?
  • वैश्विक परिप्रेक्ष्य: वर्ग विभाजन केवल हिंदू धर्म की समस्या नहीं है।
    • इस्लाम: अशरफ और पसमांदा मुसलमानों के बीच का विभाजन।
    • ईसाइयत: दलित ईसाइयों और सवर्ण ईसाइयों के बीच का अंतर।
    • सिख धर्म: जट सिख और मजहबी सिखों के बीच की खाई।
  • मनुस्मृति का हौवा: आज 99% सवर्णों के घर में मनुस्मृति नहीं है। युवा पीढ़ी इसे भूल चुकी है, लेकिन राजनीतिक दल इसे बार-बार कब्र से निकालते हैं ताकि समाज में ध्रुवीकरण बना रहे।

4. ब्राह्मण: ‘फॉरवर्ड’ टैग के पीछे की कड़वी सच्चाई

विडंबना यह है कि जिस ‘ब्राह्मण’ को सवर्ण समाज का चेहरा या ब्रांड एंबेसडर बना दिया गया है, वह आर्थिक रूप से सबसे असुरक्षित स्थिति में है।

  • आर्थिक विपन्नता: कई अध्ययनों (जैसे नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस – NSSO) के संकेत मिलते हैं कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में ब्राह्मणों की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के आसपास जीवन यापन कर रही है।
  • वोट बैंक की कमी: वे किसी भी राज्य में निर्णायक वोट बैंक नहीं हैं, इसलिए उनके अधिकारों की बात करना राजनीतिक दलों के लिए ‘घाटे का सौदा’ है।
  • अल्पसंख्यक स्थिति: संख्या बल के आधार पर कई क्षेत्रों में वे वास्तविक अल्पसंख्यक हैं, फिर भी उनके हितों की रक्षा के लिए कोई ‘सेक्युलर’ मंच मौजूद नहीं है।

5. सामाजिक समरसता बनाम राजनीतिक षड्यंत्र

भारत का समाज अपनी गति से बदल रहा है, लेकिन राजनीति उसे पीछे खींच रही है।

  • इंटर-कास्ट मैरिज का बढ़ता ग्राफ: हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में हर 6 में से 1 शादी अंतरजातीय हो रही है। शहरों में यह आंकड़ा और भी बेहतर है।
  • बाजार का कोई धर्म नहीं: जब आप डॉक्टर के पास जाते हैं, मॉल में शॉपिंग करते हैं या किसी शिक्षक से पढ़ते हैं, तो आप उसकी जाति नहीं पूछते। भारत का ‘बाजार’ और ‘युवा’ जाति व्यवस्था को ध्वस्त कर चुके हैं।
  • राजनीति का डर: राजनीतिक दलों को डर है कि अगर सवर्ण, पिछड़ा और दलित एक साथ विकास की बात करने लगे, तो उनकी ‘पहचान की राजनीति’ खत्म हो जाएगी। इसलिए वे ‘जाति जनगणना’ और ‘आरक्षण’ जैसे मुद्दों को हवा देकर घावों को ताजा रखते हैं।

6.”क्या अतीत की गलतियों का किराया आज की पीढ़ी चुकाएगी?”

“अक्सर बुद्धिजीवियों द्वारा तर्क दिया जाता है कि कमजोर को ज्यादा संसाधन मिलने चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी को सिर्फ इसलिए भूखा रखा जा सकता है क्योंकि उसके पूर्वजों का पेट भरा हुआ था? अगर आज का ‘फॉरवर्ड’ युवा खुद अभाव में है, तो उसे अतीत के ‘विशेषाधिकार’ का ताना देना मानसिक प्रताड़ना है। यह वैसा ही है जैसे किसी निर्दोष को इसलिए सजा देना क्योंकि वह एक ऐसे परिवार में जन्मा है जिसका इतिहास विवादित रहा हो।”


7.”न्याय का अर्थ ‘हाथ पकड़कर ऊपर उठाना’ होना चाहिए, न कि ‘किसी का पैर खींचकर उसे नीचे गिराना’।

विकास का अर्थ सबको साथ लेकर चलना है, न कि अतीत के नाम पर नई दीवारें खड़ी करना।”

अक्सर तर्क दिया जाता है कि सवर्ण समाज ‘विशेषाधिकार प्राप्त’ (Privileged) है। लेकिन इस नैरेटिव की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह चंद लोगों की सफलता को पूरे समाज की संपन्नता मान लेता है। इसे दो तर्कों से समझा जा सकता है:

1. गांव और चोरी का उदाहरण: सामूहिक सजा का अन्याय

न्यायशास्त्र का बुनियादी सिद्धांत है कि अपराध व्यक्तिगत होता है, सामूहिक नहीं।

“अगर किसी गांव में एक व्यक्ति चोरी करते पकड़ा जाता है, तो क्या पूरे गांव को ‘चोर’ घोषित कर देना चाहिए? क्या उस चोर के पड़ोसियों या उसके वंशजों को सदियों तक अपराधी माना जाना चाहिए? आज के सवर्ण युवाओं के साथ यही हो रहा है। अगर इतिहास के किसी कालखंड में कुछ लोगों ने गलत किया, तो उसकी कीमत आज का वह गरीब सवर्ण युवा क्यों चुकाए, जिसने कभी किसी का हक नहीं छीना?”

2. सफलता का भ्रम और ‘आरक्षित संपन्नता’

यह कहना कि “सवर्णों ने तरक्की की है इसलिए उन्हें मदद की जरूरत नहीं है,” एक खतरनाक सामान्यीकरण (Generalization) है।

  • सवर्णों की कड़वी सच्चाई: सवर्ण समाज का एक छोटा सा हिस्सा शायद संपन्न हो, लेकिन एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी झुग्गियों में, छोटे खेतों में और मामूली नौकरियों में संघर्ष कर रहा है।
  • दोहरा मापदंड: विडंबना देखिए, जिस सवर्ण बच्चे के पिता की छोटी सी दुकान है, उसे ‘विशेषाधिकार प्राप्त’ मानकर प्रतियोगिता से बाहर कर दिया जाता है। दूसरी ओर, जिस आरक्षित वर्ग के परिवार में पिता आईएएस (IAS) या बड़े अधिकारी बन चुके हैं, उनके बच्चों को फिर से आरक्षण का लाभ दिया जाता है।

3. असली सवाल: विरासत में क्या मिलना चाहिए?

यदि ‘दूध के गिलास’ वाला तर्क यह कहता है कि कमजोर को ज्यादा मिलना चाहिए, तो फिर यह नियम हर जगह लागू हो:

  • अगर किसी के पिता को नौकरी और आरक्षण के जरिए ‘सक्षम’ बनाया जा चुका है, तो उसके बेटे को ‘कमजोर’ की श्रेणी में क्यों रखा जा रहा है?
  • क्या यह ‘असमानता’ को खत्म करना है या एक नई ‘अभिजात्य श्रेणी’ (Elite Class) पैदा करना है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लाभ लेती रहे?

एक्सपर्ट ओपिनियन: क्या होना चाहिए समाधान?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब समय आ गया है कि भारत “Identity Politics” से निकलकर “Issue-based Politics” की ओर बढ़े।

“भारत में केवल दो ही श्रेणियाँ होनी चाहिए: सक्षम (संपन्न) और अक्षम (वंचित)। आर्थिक स्थिति ही आरक्षण और सरकारी लाभ का एकमात्र आधार होनी चाहिए।”

निष्कर्ष

आज का सवर्ण समाज किसी का हक छीनना नहीं चाहता। वह केवल ‘समान अवसर’ और ‘गरिमा’ की मांग कर रहा है। यदि योग्यता (Merit) को इसी तरह जातिगत राजनीति की वेदी पर चढ़ाया गया, तो हम केवल एक वर्ग को ही नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक प्रगति को भी पीछे धकेल देंगे।

समाज घावों को भरना चाहता है, लेकिन राजनीति उन घावों को कुरेदकर अपना अस्तित्व बचाती है। यह हमें तय करना है कि हम एक समरस समाज चाहते हैं या नफरत में बंटा हुआ देश।

Vimarsh 360

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