हुमायूं कबीर और ओवैसी का ‘गठजोड़’: क्या बंगाल में ममता को घेरने की यह BJP की ‘साइलेंट स्क्रिप्ट’ है?
1 मुस्लिम वोट बैंक: ममता का ‘अभेद्य किला’
बंगाल की सत्ता का रास्ता कोलकाता के कालीघाट से नहीं, बल्कि मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर की गलियों से होकर गुजरता है। राज्य में लगभग 27% से 30% मुस्लिम आबादी है जो करीब 100 से 110 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है।
2021 के विधानसभा चुनाव और हालिया 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े गवाह हैं — जब तक यह वोट बैंक एकमुश्त (Consolidated) रहता है, तब तक ममता बनर्जी को हराना ‘लोहे के चने चबाने’ जैसा है।
| चुनाव | BJP (हिंदू वोट %) | TMC (हिंदू वोट %) | TMC (मुस्लिम वोट %) | Left+Cong (मुस्लिम %) |
|---|---|---|---|---|
| 2019 लोकसभा | 57% | 32% | 70% | 25% |
| 2021 विधानसभा | 50% | 39% | 75% | 15% |
| 2024 लोकसभा | 48% | 40% | 80% | 12% |
विश्लेषण स्पष्ट है: BJP ने हिंदू वोटों में पकड़ बनाई है, लेकिन ममता ने हिंदू महिलाओं (लक्ष्मी भंडार योजना) + 80% मुस्लिम वोट का ऐसा ‘विजेता समीकरण’ बना लिया है जिसे तोड़ना ही BJP का प्राथमिक लक्ष्य है।
हुमायूं कबीर — पूर्व TMC विधायक, भरतपुर (मुर्शिदाबाद)
2 हुमायूं कबीर: ‘एसेट’ या BJP के लिए ‘कैटेलिस्ट’?
मुर्शिदाबाद के भरतपुर से विधायक हुमायूं कबीर अपने बयानों के कारण हमेशा विवादों में रहते हैं। उनका हालिया बयान — “हम अल्पसंख्यक हैं लेकिन अगर हमने ताकत दिखाई तो भागीरथी में बहा देंगे” — केवल एक बयान नहीं था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयान सीधे तौर पर ‘काउंटर-पोलराइजेशन’ को जन्म देते हैं। जब एक तरफ से ऐसी उग्र बयानबाजी होती है, तो दूसरी तरफ हिंदू वोटों का एकीकरण BJP के पक्ष में आसान हो जाता है।
हकीकत यह है कि उनके बयान ममता बनर्जी को ‘रक्षात्मक’ (Defensive) मोड में ला देते हैं। और BJP को ‘तुष्टिकरण’ के नैरेटिव को धार देने का मौका मिल जाता है। ममता चाहकर भी कबीर पर कार्रवाई नहीं कर सकतीं — क्योंकि मुर्शिदाबाद बेल्ट में उनकी अपनी पकड़ है।
असदुद्दीन ओवैसी — AIMIM अध्यक्ष
3 ओवैसी फैक्टर: ‘वोट कटुआ’ या पहचान की नई राजनीति?
असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM का बंगाल में प्रवेश ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी सिरदर्द है। BJP की रणनीति यहाँ बहुत साफ है — वोटों का बिखराव (Vote Fragmentation)।
बिहार के सीमांचल मॉडल — जहाँ ओवैसी ने 5 सीटें जीतकर महागठबंधन का खेल बिगाड़ दिया था — को BJP बंगाल में दोहराना चाहती है। यदि ओवैसी बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में महज 10-15% वोट भी काट लेते हैं, तो कम से कम 40 सीटों पर TMC का समीकरण बिगड़ जाएगा।
4 बंगाल की ‘निर्णायक’ सीटों का भूगोल
294 सीटों का गणित समझना जरूरी है। तीन श्रेणियों में बंटी ये सीटें तय करेंगी 2026 का नतीजा:
5 BJP की ‘डबल-एज्ड’ रणनीति
BJP बंगाल में दो मोर्चों पर एक साथ काम कर रही है। यह रणनीति जितनी सरल दिखती है, उतनी ही घातक है:
🔴 मोर्चा 1: हिंदू एकजुटता
संदेशखाली और हुमायूं कबीर के बयानों को आधार बनाकर ‘हिंदू गौरव’ और ‘सुरक्षा’ का मुद्दा उठाना। लक्ष्य: हिंदू वोट 48% से 60%+ पर पहुंचाना।
🔵 मोर्चा 2: मुस्लिम वोट बिखराव
ओवैसी (AIMIM) और ISF जैसे दलों को जगह मिलने देना। लक्ष्य: TMC का 80% मुस्लिम वोट 65% से नीचे लाना — बस इतना काफी है।
BJP जानती है कि जब तक मुस्लिम वोट बैंक ‘सॉलिड’ है, 40% हिंदू वोटों के साथ ममता को हराना नामुमकिन है। इसलिए ‘मुस्लिम वोटों का बंटवारा’ ही 2026 की मास्टर-चाबी है।
6 ममता की चुनौती: ‘न्यू TMC’ बनाम ‘ओल्ड गार्ड’
ममता बनर्जी के सामने केवल बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि आंतरिक कलह भी है। अभिषेक बनर्जी की ‘न्यू TMC’ एक साफ-सुथरी छवि चाहती है, जबकि हुमायूं कबीर जैसे ‘ओल्ड गार्ड’ पुरानी शैली की आक्रामक राजनीति कर रहे हैं।
यह ममता की सबसे बड़ी दुविधा है — अगर कबीर पर कार्रवाई करती हैं, तो मुस्लिम आधार खोने का जोखिम। अगर नहीं करतीं, तो हिंदू वोटर छिटककर BJP के पास जा रहा है। दोनों तरफ नुकसान।
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि जब राजनीति ‘मंदिर-मस्जिद’ और ‘बहा देने’ वाले बयानों पर सिमट जाती है, तो सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) गौण हो जाती है। और यही BJP चाहती है।
निष्कर्ष: क्या वाकई कोई ‘स्क्रिप्ट’ है?
यह कहना जल्दबाजी होगी कि हुमायूं कबीर और ओवैसी सीधे BJP के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। लेकिन राजनीति में ‘प्रभाव’ मायने रखता है, ‘इरादा’ नहीं। इन दोनों की सक्रियता का सीधा फायदा (Beneficiary) BJP को मिलता दिख रहा है।
बंगाल अब उस मोड़ पर है जहाँ ‘सेकुलरिज्म’ की ढाल कमजोर पड़ रही है और ‘पहचान की राजनीति’ हावी हो रही है। यदि ममता इस बिखराव को रोकने में नाकाम रहीं, तो 2026 में बंगाल का सिंहासन डोल सकता है।
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