TRUMP का ‘Board of Peace’ सुपर-फ्लॉप: NATO ने ठुकराया, G7 गायब — क्या यहीं से American Downfall शुरू?

TRUMP का ‘Board of Peace’ बुरी तरह पिटा!

नई दिल्ली, 24 जनवरी 2026TRUMP का ‘Board of Peace’सुपर-फ्लॉप. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान अपने महत्वाकांक्षी “बोर्ड ऑफ पीस” (Board of Peace) का चार्टर साइन किया। शुरुआत में गाजा संघर्ष के बाद पुनर्निर्माण और शांति के लिए बनाया गया यह बोर्ड अब वैश्विक संघर्षों को सुलझाने का दावा कर रहा है। ट्रंप ने इसे UN का पूरक बताया, लेकिन कई विशेषज्ञ इसे संयुक्त राष्ट्र का विकल्प या प्रतिद्वंद्वी मान रहे हैं।

समस्या यह है कि 60 से ज्यादा देशों को भेजे गए न्योते के बावजूद केवल 19-20 देशों ने ही चार्टर साइन किया। G7 के ज्यादातर सदस्य, कई NATO सहयोगी और BRICS के बड़े देश या तो अनुपस्थित रहे या उन्होंने स्पष्ट रूप से दूरी बनाए रखी। अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसे अमेरिकी कूटनीति की बड़ी हार और वैश्विक स्तर पर अमेरिकी प्रभाव के क्षरण का संकेत बता रहा है। क्या ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति ने उन्हें दुनिया में अकेला कर दिया?

TRUMP का ‘Board of Peace’

(चित्र: दावोस में ट्रंप बोर्ड ऑफ पीस चार्टर साइनिंग के दौरान – कई सीटें खाली दिख रही हैं। स्रोत: ISPI)

बोर्ड ऑफ पीस क्या है और क्यों बना?

ट्रंप प्रशासन ने यह बोर्ड मूल रूप से गाजा में संघर्षविराम और पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए शुरू किया था। लेकिन चार्टर में इसका दायरा वैश्विक कर दिया गया – दुनिया भर के संघर्षों को सुलझाना, शांति स्थापित करना और “विफल संस्थाओं” से अलग एक नया तंत्र बनाना।

खास बातें:

  • ट्रंप खुद जीवन भर के लिए चेयरमैन रहेंगे।
  • सदस्य देशों को 3 साल का कार्यकाल, लेकिन $1 बिलियन देकर परमानेंट सीट खरीद सकते हैं।
  • बोर्ड में अमेरिकी अधिकारी जैसे मार्को रूबियो, जेरेड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ शामिल।
TRUMP का ‘Board of Peace’ बुरी तरह पिटा! NATO ने ठुकराया, G7 गायब। क्या यहीं से अमेरिकी ताकत के टूटने की शुरुआत हुई?
TRUMP का ‘Board of Peace’ बुरी तरह पिटा! NATO ने ठुकराया, G7 गायब।

कितने देश जॉइन किए और कौन गायब रहा?

रिपोर्ट्स के अनुसार, 62 देशों को न्योता भेजा गया, लेकिन दावोस साइनिंग में केवल 19-20 देशों ने हिस्सा लिया या सहमति दी। जॉइन करने वाले ज्यादातर मिडिल ईस्ट सहयोगी ( सऊदी अरब, UAE, बहरीन, जॉर्डन, कतर, मिस्र), कुछ पूर्वी यूरोपीय (हंगरी, तुर्की, कोसोवो) और एशियाई-अफ्रीकी देश (इंडोनेशिया, पाकिस्तान, पराग्वे, वियतनाम आदि)।

बड़े देशों का बहिष्कार:

  • G7: फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन ने इनकार या चुप्पी।
  • NATO: कनाडा का न्योता वापस लिया गया (पीएम मार्क कार्नी की आलोचना के बाद)।
  • यूरोपीय यूनियन: ज्यादातर देशों ने सामूहिक रूप से दूरी बनाई, डर कि यह NATO और UN को कमजोर करेगा।
  • BRICS: साउथ अफ्रीका को न्योता ही नहीं मिला; भारत, चीन और रूस ने अभी जवाब नहीं दिया।

(चित्र: ट्रंप दावोस में बोर्ड ऑफ पीस की घोषणा करते हुए – सीमित उपस्थिति।)

बहिष्कार के पीछे असली कारण

  1. ट्रंप की ट्रांजेक्शनल डिप्लोमेसी: सहयोगी देशों को “लेन-देन” की तरह ट्रीट करना – अब वफादारी खत्म।
  2. UN पर खतरा: कई देशों को लगता है कि यह संयुक्त राष्ट्र की जगह लेगा। यूरोपीय डिप्लोमेट्स ने इसे “ट्रंप यूनाइटेड नेशंस” कहा।
  3. व्यक्तिगत एजेंडा: ट्रंप का जीवन भर चेयरमैन रहना और वीटो पावर लोकतांत्रिक नहीं लग रहा।
  4. ग्लोबल साउथ का रुख: भारत जैसे देश बहुध्रुवीय दुनिया चाहते हैं, जहां फैसले वाशिंगटन से नहीं होते।

आर्थिक और भूराजनीतिक नतीजे

  • डॉलर का प्रभुत्व खतरे में: देश लोकल करेंसी में व्यापार बढ़ा रहे।
  • BRICS को फायदा: बहुध्रुवीय दुनिया मजबूत।
  • अमेरिकी सॉफ्ट पावर का क्षरण: जब छोटे-मोटे देशों को “खरीदना” पड़े, तो नैतिक अधिकार खत्म।

स्रोत: Financial Times और NYT ओपिनियन पीस (जनवरी 2026)

निष्कर्ष: पोस्ट-अमेरिकन दुनिया की शुरुआत?

यह बोर्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षा का प्रतीक है, लेकिन सीमित समर्थन अमेरिकी प्रभाव की गिरावट दिखाता है। भारत ने दूर रहकर सही किया – हमारी स्वतंत्र विदेश नीति मजबूत बनी रही। आने वाले महीने बताएंगे कि ट्रंप और आक्रामक होंगे या नीतियां बदलेंगे।

FAQ: ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस पर आपके सवालों के जवाब

1. बोर्ड ऑफ पीस असल में क्या है?
गाजा शांति योजना से शुरू हुआ तंत्र, अब वैश्विक संघर्ष सुलझाने का दावा। ट्रंप जीवन भर चेयरमैन, $1 बिलियन में परमानेंट सीट।

2. कितने देश जॉइन किए और कौन प्रमुख गायब हैं?
19-20 देश जॉइन (मुख्यतः मिडिल ईस्ट और कुछ छोटे)। G7, कई NATO देश, चीन, रूस (अभी अनिश्चित), साउथ अफ्रीका (न्योता नहीं) गायब।

3. बड़े देशों ने क्यों बहिष्कार किया?
UN को कमजोर करने का डर, ट्रंप की व्यक्तिगत सत्ता और ट्रांजेक्शनल नीति।

4. भारत का स्टैंड क्या है?
भारत को न्योता मिला या नहीं, इस पर स्पष्ट जानकारी नहीं, लेकिन हमने हिस्सा नहीं लिया। यह बहुध्रुवीय नीति के अनुरूप है।

5. क्या यह अमेरिका की गिरावट का सबूत है?
कई विश्लेषक हां कहते हैं – सहयोगी दूर हो रहे। लेकिन ट्रंप समर्थक इसे “नई शुरुआत” बताते हैं। (स्रोत: Foreign Policy और Global Times)

आपकी राय क्या है? भारत को जॉइन करना चाहिए था या नहीं? कमेंट करें। अगर पसंद आया तो शेयर करें। जय हिंद!

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