तलाक का जश्न: सशक्तिकरण है या अगली पीढ़ी के लिए खतरे की घंटी?
58% तलाक महिलाएं शुरू करती हैं। दो दशकों में मामले 50% बढ़े। माता-पिता ढोल बजाते हैं। लेकिन दक्षिण कोरिया जल रहा है, चीन सिकुड़ रहा है — और भारत उसी राह पर खड़ा है।
वरिष्ठ पत्रकार क्षमा शर्मा का 8 अप्रैल 2026 का लेख पढ़ा — हिंदुस्तान में छपा था। मेरठ और मध्य प्रदेश की उन घटनाओं का जिक्र था जहां पिता अपनी तलाकशुदा बेटी का ढोल-नगाड़ों और फूलों से स्वागत कर रहे हैं। लेख सीधा कहता है — तलाक अब छिपाने की नहीं, गर्व की बात है।
आंकड़े भी साफ हैं। शोध बताते हैं कि 58% तलाक के मामलों में महिलाएं पहल करती हैं। पिछले दो दशकों में तलाक के मामले 50% से ज्यादा बढ़े हैं। भारत की कुल दर 1.1% है — लेकिन दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु में कोर्ट में मामले तीन गुना तक बढ़ चुके हैं।
ठीक है। इससे कोई असहमति नहीं।
लेकिन सवाल यह है — क्या हम सिर्फ इतना सोचकर रुक जाएं?
Toxic की परिभाषा कौन तय कर रहा है?
सवाल यह नहीं है कि toxic marriage में बने रहना चाहिए या नहीं। सवाल यह है — toxic की परिभाषा कौन तय कर रहा है?
घर में सब्जी न लाना। खाना बनाने में मदद न करना। रात को टीवी का रिमोट न देना। अगर यही toxic है — तो हम एक ऐसे समाज की तरफ बढ़ रहे हैं जहां हर असुविधा तलाक का कारण बन जाएगी।
पांच घंटे की ट्रेन यात्रा में भी सामने बैठे अजनबी से थोड़ा समझौता करना पड़ता है — बर्थ बदलनी, खिड़की बंद करनी, आवाज धीमी रखनी। तो जो रिश्ता पचास साल निभाना है, उसमें समझौता करना “toxic” कैसे हो गया?
आज Instagram Reels, YouTube Shorts और WhatsApp forwards तय कर रहे हैं कि रिश्ता toxic है या नहीं। एक 22 साल की लड़की — जो अभी तक जिंदगी की असली मुश्किलें नहीं जानती — social media influencer की बात सुनकर अपनी शादी को “red flag” घोषित कर देती है। और माता-पिता पीछे से “हम हैं ना” कहकर exit को और आसान बना देते हैं।
यह सशक्तिकरण नहीं है। यह एक नई extreme है।
एक पुरानी गलती से दूसरी गलती की तरफ
भारत में दशकों तक एक extreme था — स्त्री को हर हाल में सहना है, चाहे कुछ भी हो। यह गलत था। इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन अब दूसरी extreme दिखने लगी है — बिना किसी समझौते के exit। और समाज, माता-पिता, कोर्ट, कानून — सब इस exit को आसान बना रहे हैं।
यूरोप और अमेरिका में तलाक दर 40 से 50 प्रतिशत है। वहां बुजुर्गों में अकेलापन महामारी बन चुका है। सिंगल-पैरेंट बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सामाजिक विघटन आम हो गया है। क्या हम उसी राह पर हैं?
डेमोग्राफिक चेतावनी — 2050 का भारत देखिए
आज भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम है। यह हमारी ताकत है।
लेकिन UNFPA की India Ageing Report 2023 साफ कहती है — 2050 तक 60 साल से ऊपर की आबादी 347 मिलियन यानी करीब 20.8% हो जाएगी। आज यह सिर्फ 10.5% है।
अगर तलाक, separation और single-parent परिवारों का यही ट्रेंड जारी रहा — तो joint family का वो support system जो करोड़ों बुजुर्गों को थामे हुए है, वो टूट जाएगा।
जो माता-पिता आज बेटी के तलाक पर ढोल बजा रहे हैं — क्या उन्होंने सोचा है कि 25-30 साल बाद उनकी देखभाल कौन करेगा? तब सरकार इन करोड़ों बुजुर्गों को अकेले संभाल पाएगी?
दक्षिण कोरिया और चीन — भारत के लिए आईना
दुनिया में दो देश ऐसे हैं जो आज भुगत रहे हैं जो भारत कल भुगत सकता है।







