राजनेता या कूटनीतिज्ञ — विदेश मंत्री कौन बेहतर होता है?
जयशंकर पर चावला की आलोचना का सच
प्रभु चावला ने New Indian Express में लिखा कि जयशंकर के पास राजनीतिक जनादेश नहीं है इसलिए वे “सत्ता की वास्तविक गतिशीलता से कटे हुए” हैं। लेकिन सिमला समझौते की ऐतिहासिक गलती, नेहरू का UNSC निर्णय और अभी चल रहा ईरान युद्ध — इतिहास खुद जवाब दे रहा है।
वह आलोचना जिसने बहस छेड़ दी
28 मार्च 2026 को वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने New Indian Express में एक कॉलम लिखा — “India at Crossroads of Global Trust”। इसमें उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के पास “घरेलू राजनीतिक आधार नहीं है” और उनकी “नौकरशाही वाली सटीकता ने एक ऐसा अलग-थलग माहौल बना दिया है जो सत्ता की वास्तविक गतिशीलता से कटा हुआ है।”
Newindianexpress — India at Crossroads of Global Trust (28 March 2026)यह दावा सुनने में ठोस लगता है। लेकिन क्या यह सच है? एक geopolitical journalist की नजर से देखें तो यह एक क्लासिक “ब्यूरोक्रेट vs पॉलिटिशियन” बहस है — जो भारतीय विदेश नीति की असली जटिलता को बहुत सरल बना देती है।
जब विदेशी नेताओं के साथ कूटनीतिक मीटिंग में पार्टी लाइन का दबाव और वोटरों को जवाब देने का बोझ नहीं होता, तो व्यक्ति अक्सर केवल राष्ट्रहित की बात सोच पाता है।
— दीपक चौधरी, Vimarsh360विचार प्रक्रिया बनाम राजनीतिक जनादेश
हर इंसान की सोचने की प्रक्रिया या उसका thought process अलग क्यों होता है, क्योंकि वह उसके अनुभवों, काम के माहौल और संस्थागत स्मृति से बनती है। एक career diplomat और एक elected politician का thought process मौलिक रूप से अलग होता है। और यह अंतर विदेश मंत्री जैसे संवेदनशील पद पर बहुत मायने रखता है।
विदेश मंत्री की हर बैठक में, हर बयान में — PMO या पार्टी से पहले अनुमति लेना न सिर्फ व्यावहारिक नहीं होता, बल्कि असंभव होता है। उस क्षण उसका अपना trained thought process ही काम आता है। अब सोचिए — क्या कोई भी लोकप्रिय राजनेता, चाहे वह कितना भी कुशल हो, उतनी गहराई से दूसरे देशों की आंतरिक राजनीति, कूटनीतिक संकेतों और रणनीतिक nuances को समझ सकता है — जितना एक career diplomat दशकों से समझता आया है?
डॉ. एस. जयशंकर ने 1977 में Indian Foreign Service join की। चेक गणराज्य, सिंगापुर, चीन (2009–13) और अमेरिका (2013–15) में राजदूत रहे। 2015–18 तक विदेश सचिव रहे। India-US civil nuclear deal की नींव रखने में भूमिका निभाई। 2019 में सीधे मोदी कैबिनेट में विदेश मंत्री बने। यह 38+ वर्षों का institutional training है — कोई रातोरात हासिल नहीं होता।
जब राजनीतिक नेतृत्व ने कूटनीतिक अवसर गंवाए
चावला जी उन दिग्गज राजनेता-विदेश मंत्रियों की तारीफ करते हैं — नरसिम्हा राव, प्रणब मुखर्जी, जसवंत सिंह, सुषमा स्वराज। इन सबने निश्चित रूप से अपने-अपने दौर में योगदान दिया। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जब विदेश नीति पूरी तरह राजनीतिक thought process के हाथ में होती है — तो बड़ी चूकें भी होती हैं।
🔖 सिमला समझौता 1972: जीती बाजी हारने का सबसे बड़ा उदाहरण
1971 में भारत ने पाकिस्तान पर निर्णायक सैन्य जीत हासिल की। 93,000 पाकिस्तानी POWs (युद्धबंदी) भारत के कब्जे में थे। पश्चिमी मोर्चे पर बड़ी territory जीती थी। पाकिस्तान पूरी तरह कमजोर स्थिति में था। अब कूटनीति में यह “leverage का golden moment” होता है।
लेकिन 1972 के सिमला समझौते में — इंदिरा गांधी और भुट्टो के बीच — भारत ने लगभग सारी conquered territory और सभी 93,000 POWs बिना किसी ठोस कश्मीर समाधान के लौटा दिए। बदले में मिला सिर्फ यह वादा कि कश्मीर bilateral मुद्दा रहेगा — UN का तीसरा पक्ष नहीं। लेकिन यह वादा भी लिखित में इतना कमजोर था कि पाकिस्तान ने बाद में कभी इसका पालन नहीं किया।
इंदिरा गांधी उस समय “दुर्गा” के रूप में पूजी जा रही थीं। लेकिन वार्ता में भुट्टो की emotional appeal — “viable Pakistan की जरूरत” — के सामने सैन्य जीत का leverage काम नहीं आया। यही राजनीतिक thought process की सीमा है।
अनेक रणनीतिक विश्लेषक इसे “lost opportunity” मानते हैं। एक senior career diplomat — जिसका thought process institutional memory और long-term strategic consequences पर trained होता है — शायद इस leverage को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करता।
🔖 नेहरू और UNSC: Asian solidarity की कीमत
1950 के दशक में अमेरिका ने informal तरीके से भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की permanent seat की संभावना की बात की — जो उस समय Communist China के पास थी। नेहरू ने इस विचार को अस्वीकार कर दिया। उनका तर्क था — “चीन को उसकी सीट से हटाकर हम नहीं जाएंगे।”
यह नेहरू का व्यक्तिगत idealistic thought process था — Asian solidarity, anti-imperialism, Panchsheel। बहुत उदात्त। लेकिन आज वही चीन UNSC में भारत की permanent membership को block करता है। नेहरू के thought process में idealism थी, लेकिन decades-long strategic consequences नहीं। यह institutional diplomatic training की नहीं, personal political vision की उपज थी।
Coalition Era की कूटनीतिक paralysis
- तमिलनाडु के घरेलू राजनीतिक दबाव से श्रीलंका नीति बार-बार प्रभावित हुई — IPKF तबाही इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है
- पश्चिम बंगाल की राजनीति के कारण भारत-बांग्लादेश तीस्ता जल संधि दशकों से अटकी है
- पाकिस्तान के साथ संबंध अक्सर घरेलू vote-bank की भावनाओं से तय होते रहे
ईरान युद्ध 2026: राष्ट्रहित की असली परीक्षा
फरवरी 2026 से US-Israel बनाम Iran युद्ध चल रहा है। भारत के लिए यह एक बेहद जटिल कूटनीतिक चुनौती है। देश के अंदर भावनाएं बंटी हुई हैं — एक वर्ग ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से ईरान के प्रति सहानुभूति रखता है। वहीं दूसरा वर्ग रक्षा समझौतों और कारगिल वॉर से अभी तक के इसराइल के सपोर्ट के कारण इसराइल से सहानुभूति रखता है। लेकिन भारत के राष्ट्रीय हित बहुत अलग दिशा में हैं।
विधानसभा परिसर के बाहर पत्रकारों से बातचीत में महबूबा मुफ्ती ने ईरान-अमेरिका युद्ध पर कहा — “अमेरिका ने जिस तरह से ईरान पर हमला किया है, वह अत्यंत निंदनीय है। यह पूरी इंसानियत के खिलाफ है। अमेरिका-इजरायल यह युद्ध हारेंगे, क्योंकि उनकी फौज जमीनी लड़ाई लड़ने से बच रही है। इंशाल्लाह, ईरान ही जीतेगा।”
🔗 jagran.com — पूरी रिपोर्ट पढ़ेंअब कल्पना करें — अगर एक “popular elected” विदेश मंत्री होता, जो किसी ऐसे क्षेत्र से आया हो जहाँ ईरान के प्रति emotional sympathy हो, या जिसे अपनी पार्टी के एक वर्ग को खुश रखना हो — तो क्या वह महबूबा मुफ्ती जैसे बयान के दबाव से बिल्कुल अछूता रह पाता? या घरेलू भावनाओं के दबाव में कोई ऐसा बयान दे देता जो Gulf देशों को नाराज करता, या Israel के साथ रक्षा सहयोग को खतरे में डालता?
90 लाख भारतीय Gulf में
UAE, Saudi Arabia, Qatar, Kuwait में काम कर रहे भारतीय — जिनकी सुरक्षा और remittances India की economy की lifeline है।
Israel से रक्षा साझेदारी
Drones, surveillance technology, intelligence sharing, joint production — यह partnership भारत की सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य है।
Strait of Hormuz और ऊर्जा
भारत का बड़ा हिस्सा Gulf से तेल आयात करता है। Hormuz बंद हुआ तो ऊर्जा संकट। जयशंकर ने Hormuz पर Iran से बातचीत की।
Balanced Diplomacy
March 2026 में जयशंकर ने Brussels में EU counterparts से Iran पर चर्चा की। भारत ने de-escalation की अपील की — किसी पक्ष की निंदा नहीं।
जयशंकर ने Iran से Strait of Hormuz खुला रखने की बात की, भारतीयों को सुरक्षित निकालने का आश्वासन दिया, EU से diplomacy की और किसी भी पक्ष की खुली निंदा नहीं की। यह “depoliticisation” नहीं है — यह national interest-centric professionalism है।
India TV — Israeli FM ने जयशंकर से की बात, Tehran के खिलाफ की शिकायत MSN Hindi — ईरान युद्ध के बीच दिल्ली में ईरान उप-विदेश मंत्री से मिले जयशंकरजयशंकर के कार्यकाल में भारत ने क्या हासिल किया?
अगर “अलग-थलग” और “कटे हुए” की बात करें, तो results देखने होंगे। 2019 से 2026 तक जयशंकर के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति के कुछ measurable outcomes:
G20 — ऐतिहासिक सफलता (2023)
“वसुधैव कुटुम्बकम्” theme। African Union को G20 का स्थायी सदस्य बनवाया। Russia-Ukraine युद्ध के बावजूद consensus declaration पारित।
Vaccine Maitri (2020–22)
100+ देशों को करोड़ों वैक्सीन doses। दुनिया की फार्मेसी के रूप में भारत की soft power का ऐतिहासिक प्रदर्शन।
Quad को मजबूती
India, US, Japan, Australia। Indo-Pacific में समुद्री सुरक्षा, tech और supply chain resilience। कई leader-level summits।
Russia-Ukraine: Balanced Approach
रूस से सस्ता तेल — ऊर्जा सुरक्षा। West से दूरी नहीं — strategic autonomy। “Europe को grow out करना होगा” — जयशंकर का ऐतिहासिक बयान।
Global South की आवाज
Voice of Global South Summit 2023–24। ISA, CDRI जैसी multilateral पहलें। अफ्रीका और Pacific में नए दूतावास।
India-US Strategic Partnership
iCET (technology), MQ-9B drones, jet engines, Artemis Accords। 2026 में trade deal — Mission 500 ($500 billion by 2030)।
Galwan Crisis Management (2020)
चीन के साथ border clash को full-scale conflict बनने से रोका। High-level talks से India की territorial interests protect की।
Neighbourhood First
Sri Lanka आर्थिक संकट में first responder। Bangladesh, Bhutan, Nepal के साथ connectivity projects। SAGAR doctrine को मजबूती।
Lowy Institute (Australia) के विश्लेषकों ने हाल ही में लिखा कि जयशंकर “Nehru के बाद India के सबसे Nehruvian diplomat हो सकते हैं।” Strategic autonomy, Global South leadership, Western double standards पर तीखी आलोचना — यह सब Nehru की विदेश नीति की continuity है, न isolation।
Lowy Institute — Address by Dr. S. Jaishankar, India’s Minister of External Affairsचावला सही कहाँ हैं, गलत कहाँ?
प्रभु चावला अनुभवी पत्रकार हैं और उनकी चिंता निराधार नहीं है। लोकतंत्र में जनता के प्रति जवाबदेही जरूरी है। और यह सच है कि जयशंकर के पास लोकसभा-स्तरीय mass base नहीं है।
✅ चावला जी से सहमति
- विदेश नीति में घरेलू जनमत की जानकारी और जवाबदेही जरूरी है — यह बात सही है
- जयशंकर की शैली कभी-कभी “detached” या elitist लग सकती है — यह perception valid है
- अंतिम जवाबदेही लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति होनी चाहिए — इस पर कोई विवाद नहीं
❌ चावला जी से असहमति
- “Depoliticisation” को “दुर्भाग्य” कहना अतिरंजित है — यह professionalisation है, isolation नहीं
- Coalition era में राजनीतिक विदेश मंत्रियों ने कूटनीति को अक्सर paralyzed किया — Sri Lanka, Bangladesh इसके उदाहरण हैं
- Pure politicians भी बड़ी गलतियाँ करते हैं — Simla, UNSC, IPKF इसके प्रमाण हैं
- Results बोलते हैं — G20, Quad, Vaccine Maitri, balanced Russia-Ukraine position — ये measurable outcomes हैं
- जयशंकर BJP के Rajya Sabha सांसद हैं, पार्टी के हिस्सा हैं — “politically disconnected” नहीं हैं
आधुनिक geopolitics — US-China rivalry, supply chain wars, tech decoupling, multipolar world — इतना जटिल हो गया है कि सिर्फ political intuition काम नहीं करती। Technocratic depth उतनी ही जरूरी है जितनी political legitimacy।
सबसे अच्छा मॉडल: Hybrid
विदेश नीति में perfection नहीं होती — trade-offs होते हैं। और सबसे बेहतर मॉडल वह है जहाँ:
आदर्श विदेश नीति का ढांचा
- प्रधानमंत्री स्तर पर राजनीतिक दिशा — जो लोकतांत्रिक जनादेश से आती है
- Career diplomat की institutional expertise — जो दशकों की training से आती है
- घरेलू जनमत का संतुलित समावेश — लेकिन short-term electoral pressures का दास न बनकर
मोदी-जयशंकर model में यही हो रहा है। मोदी राजनीतिक दिशा और जनादेश देते हैं। जयशंकर उस दिशा को world-class diplomatic precision के साथ execute करते हैं। NSA डोभाल strategic depth देते हैं। यह तीनों का संयोजन है।
चावला जी का सवाल valid है — accountability का। लेकिन उनका जवाब अधूरा है। “राजनीतिक जनादेश” की कमी को “दुर्भाग्य” कहना — जबकि उसी जनादेश ने Simla में leverage गंवाया, UNSC की सीट का अवसर ठुकराया, और coalition era में श्रीलंका को IPKF की तबाही दी — यह इतिहास से बेईमानी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
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